धनतेरस क्यों मानते है इसका पौराणिक महत्व क्या है? - HINDI WEB BOOK

धनतेरस क्यों मानते है इसका पौराणिक महत्व क्या है?

धनतेरस क्यों मानते है इसका पौराणिक महत्व क्या है?

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धनतेरस क्यों मानते है इसका पौराणिक महत्व क्या है? भारत वर्ष त्योहारों का देश है, यहाँ हर वर्ष अनेको त्यौहार मनाये जाते है और हर त्यौहार अपने आप में अनूठा होता है, जिसके पीछे कोई ना कोई कहानी या उद्देश्य छिपा होता है। इन्ही त्योहारों में एक है धनतेरस जिसे दीपावली से दो दिन पहले मनाया जाता है। प्रत्येक वर्ष के कार्तिक मास में कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी को धनतेरस मनाया जाता हैं। आज हम इस लेख में यह जानेगे की धनतेरस क्यों मानते है इसका पौराणिक महत्व क्या है?

धनतेरस क्यों मानते है?

धनतेरस का त्योहार हमे दीपावली के आने की पूर्व सूचना को देता है। इस दिन विशेष रूप से नए बर्तनो को खरीदना काफी शुभ माना जाता है। धनतेरस के दिन मृत्यु के देवता यमराज और आयुर्वेद के देवता भगवान धनवन्तरि की पूजा का विशेष महत्व है। 

हिन्दू धर्म में दीपावली को केवल एक दिन का नहीं बल्कि इसे पांच दिवसीय त्यौहार माना जाता है, जिसकी शुरुआत मुख्य रूप से धनतेरस के साथ ही हो जाती है। धनतेरस के पर्व को कार्तिक मास की त्रयोदशी को मनाया जाता है, फिर इसके बाद चतुर्दशी के दिन रूप चौदस और उससे अगले दिन अमावस्या को दीवाली मनाई जाती है। 

दीपावली के दिन अंधकार से भरी सारी रात हजारों दीयों की रौशनी से जगमगाने लगती है। लेकिन इन सब की शुरुवात धनतेरस से क्यों होती है और धनतेरस क्यों मानते है इसका पौराणिक महत्व क्या है? और क्यों हम ये पर्व मनाते है। इसे हम अपने लेख धनतेरस क्यों मानते है और इसका पौराणिक महत्व के द्वारा जानने का प्रयास करते है।   

धनतेरस क्यों मानते है इसका पौराणिक महत्व क्या है? Why is Dhanteras celebrated, what is its mythological significance? 

धनतेरस क्यों मानते है इसके पीछे एक पौराणिक कथा है, भगवान विष्णु के ही अंशावतार तथा देवताओं के वैद्य भगवान धन्वन्तरि का प्राकट्य कार्तिक मास के कृष्णपक्ष की त्रयोदशी को हुआ था। इसलिये इस दिन इस पर्व को प्रदोष व्यापिनी तिथि के रूप में मनाने का विधान है। इस दिन परिवार में आरोग्यता को बनाये रखने के लिए घर के मुख्य दरवाजे पर यमदेवता का स्मरण करते हुऐ दक्षिण मुख होकर अन्न आदि रखकर उस पर दीपक को प्रजवलित कर स्थापित करना चाहिए। सभी गृहस्थों को इसी अवधि के दौरान ‘ॐ नमो भगवते धन्वंतराय विष्णुरूपाय नमो नमः मंत्र द्वारा पूजन अर्चन करना चाहिए जिसके फलस्वरूप आपके परिवार में दीर्घआयु एवं आरोग्यता बनी रहती है।

धन्वन्तरी जयंती या धनतेरस को मनाये जाने के सन्दर्भ में एक पौराणिक कथा आती है, पूर्वकाल में देवराज इंद्र ने अज्ञान वश अपने अभद्र आचरण द्वारा महर्षि दुर्वासा का अपमान कर दिया था। जिससे क्रोधित हो उन्होंने इंद्र को तीनों लोकों से श्रीहीन होने का श्राप दे दिया था, जिसके फलस्वरूप अष्टलक्ष्मी पृथ्वी से विलुप्त हो अपने लोक को चलीं गयीं। तीनो लोको के श्रीहीन होने के कारण सभी देवता पुनः तीनो लोकों में श्री की स्थापना करने के उद्देश्य से व्याकुल होकर त्रिदेवों के पास गए और उनसे इस संकट से उबरने का उपाय पूछा। तब महादेव ने सभी देवों को समुद्रमंथन करने का सुझाव दिया जिसे सभी देवताओं और दैत्यों ने सहर्ष ही स्वीकार कर लिया।

समुद्र को मथने लिये मंदराचल पर्वत को मथानी बनाया गया तथा नागों के राजा वासुकी को रस्सी बनाया गया। इसमें सभी दैत्य वासुकी नाग के मुख की ओर तथा सभी देवता उनकी पूंछ की ओर थे, इसके साथ ही समुद्र मंथन को आरम्भ किया गया। समुद्रमंथन से चौदह प्रकार के प्रमुख रत्नों की उत्पत्ति हुई जिनमें से चौदहवें रत्न के रूप में स्वयं भगवान धन्वन्तरि प्रकट हुए जो अपने हाथों में अमृत का कलश लिए हुए थे। भगवान विष्णु ने इन्हें सभी देवताओं का वैद्य और समस्त वनस्पतियों तथा औषधियों का स्वामी नियुक्त किया। इन्हीं के वरदान से ही सभी वृक्षों और वनस्पतियों में रोगनाशक शक्ति का प्रादुर्भाव हुआ है।

धनतेरस क्यों मानते है?
लेकिन आजकल व्यापारियों ने ‘धनतेरस के त्यौहार’ का बाजारीकरण कर दिया है, और इस दिन को विलासिता पूर्ण वस्तुओं के क्रय का दिन घोषित कर रखा है जो सही नहीं है। इन वस्तुओ का कोई भी सम्बन्ध भगवान् धन्वन्तरि से नहीं है, क्योकि वे आरोग्य और औषधियों के देवता हैं न कि हीरे-जवाहरात या अन्य भौतिक वस्तुओं के। इसलिये इस दिन इनकी पूजा-आराधना करने का उद्देश्य केवल परिवार के लोगो को स्वास्थ्य प्रदान करना है क्योकि प्रथम सुख निरोगी काया है, जो संसार का सबसे बड़ा धन है। आयुर्वेद के अनुसार भी धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की प्राप्ति भी केवल स्वस्थ शरीर के माध्यम से ही संभव है।
 

शास्त्र भी कहते हैं कि ‘शरीर माध्यम खलु धर्म साधनम्’ अर्थात- धर्म का साधन भी निरोगी शरीर से ही संभव है। इसीलिये आरोग्य रुपी धन को प्राप्त करने के लिए ही भगवान् धन्वन्तरि की पूजा आराधना की जाती है। ऐसा माना जाता है की इस दिन श्रद्धा से की आराधना प्राणियों को पुरे वर्ष निरोगी रखती है। समुद्र मंथन से शरद पूर्णिमा के दिन चंद्रमा, कार्तिक द्वादशी के दिन कामधेनु गाय, त्रयोदशी के दिन भगवान धन्वंतरी तथा अमावस्या को महालक्ष्मी का प्राकट्य हुआ था। भगवान धन्वंतरी ने ही जनकल्याण के लिए सभी अमृतमय औषधियों की खोज की थी। इसी से धनतेरस का महत्व बढ़ जाता है, इन्हीं के वंश में उत्पन्न शल्य चिकित्सा के जनक और महर्षि विश्वामित्र के पुत्र महान ऋषि सुश्रुत हुए जिन्होंने आयुर्वेद के महानतम ग्रन्थ सुश्रुत संहिता की रचना की।

धनतेरस के महत्व को समझते हुऐ ही भारत सरकार ने इस दिन को राष्ट्रीय आयुर्वेद दिवस के रूप में मनाने का निर्णय लिया है। जैन पंथ के अनुसार जैन आगम में धनतेरस को ‘धन्य तेरस’ या ‘ध्यान तेरस’ कहा जाता हैं। ऐसी मान्यता हे इसी दिन भगवान महावीर निरोध योग को सिद्ध करने के लिये ध्यान में चले गये थे। तीन दिन के ध्यान के बाद निरोध योग को सिद्ध करते हुये दीपावली के दिन ही वो निर्वाण को प्राप्त हुये थे। तभी से यह दिन धन्य तेरस के नाम से भी प्रसिद्ध हुआ।

यम देव का धनतेरस से सम्बन्ध क्या है?  

हमारे शास्त्रों में धनतेरस के दिन ही यमराज की पूजा का विधान भी मिलता है और इससे संबंधित एक कथा भी है। इस कथा के अनुसार एक प्रतापी राजा थे जिनके कोई संतान नहीं थी। राजा ने बहुत अधिक पूजा-पाठ और यज्ञ हवन करने के बाद ईश्वर की कृपा से संतान प्राप्ति की। जब राजा ने अपने पुत्र का भविष्य ज्योतिषों से जानना चाहा तो उन्होंने बताया कि जब आपके पुत्र का विवाह होगा तो उसके 4 दिन बाद ही उसकी मृत्यु हो जाएगी। ज्योतिषों की बात को सुनकर राजा बहुत दुखी हुऐ और उन्होंने अपने पुत्र को एक ऐसे स्थान पर भेज दिया जहां पर किसी भी महिला का आना जाना प्रतिबंधित था। 

धनतेरस क्यों मानते है?


लेकिन नियति को शायद कुछ और ही मंजूर था। जहां पर राजा का पुत्र निवास कर रहा था वहां संयोग से एक राजकुमारी गुजर रही थी। उस राजकुमारी को देखकर वह राजकुमार मोहित हो गया और उन दोनों ने आपस में विवाह कर लिया। लेकिन ज्योतिषो की भविष्यवाणी के अनुसार विवाह के 4 दिन बाद ही राजकुमार की मृत्यु हो गई। तब राजकुमारी ने अपने पति के प्राणो को बचाने के लिये विलाप करते हुऐ यमराज से आग्रह किया कि वो उसके पति को जीवन दान दें। यमराज उस राजकुमारी की दशा को देखकर द्रवित हो गये तब उन्होंने उससे कहा कि धनतेरस के दिन जो भी प्राणी रात्रि के तीन पहर बीत जाने के बाद मेरा पूजन करेगा और एक दीया जला कर उसे अपने घर की दक्षिण दिशा में रखेगा तो उसके ऊपर से ‘अकाल मृत्यु’ का भय हट जाएगा। तभी से धनतेरस के दिन रात्रि के तीन पहर बीत जाने के बाद चौमुखी दिया घर के दक्षिण दिशा की तरफ रखने की प्रथा चली आ रही है।


धनतेरस के दिन यम देवता के लिये दिया जलाने की विधि क्या है? 

धनतेरस के दिन आधी रात बीत जाने के बाद ही यमराज की पूजा का विधान है, इस पूजा के लिये चौमुखी दिये का उपयोग किया जाता है। इसके लिये आपको एक मिट्टी का चौमुखी दिया चाहिये अगर आपके पास मिट्टी का दिया नहीं है तो आप आटे का भी चौमुखी दिया बनाकर उसमें सरसो का तेल डालकर उसे प्रजवलित करके अपने मुख्य द्वार के दाएं तरफ रख दें। इस बात का ध्यान रहे कि दिये की बाती का मुख दक्षिण दिशा की तरफ रहना चाहिये। इसके साथ ही आप रोली, चंदन, फूल, जल, चावल और नैवेद्य आदि अर्पण कर भगवान यमराज से निवेदन करे की परिवार में किसी की भी अकाल मृत्यु ना हो, इस कामना के साथ यम देवता की पूजा करे।

धनतेरस के दिन क्या करना चाहिए?

हिंदू धर्म में धनतेरस के त्यौहार को विशेष महत्व दिया गया है। धनतेरस के दिन से ही भगवान गणेश , मां लक्ष्मी और कुबेर देव की पूजा शुरू हो जाती है और यह पूजा दीवाली तक ऐसे ही चलती है। मान्यताओं के अनुसार धनतेरस के दिन नई चीजो को घर में लाने से मां लक्ष्मी और कुबेर देव की कृपा प्राप्त होती है और उस घर में कभी भी पैसों की कमीं नहीं रहती।

धनतेरस के दिन सोना, चांदी, पीतल और धातुओं के बर्तन आदि खरीदना शुभ माना जाता है। भगवान धनवंतरी जब समय समुद्र मंथन से प्रकट हुए थे, उस समय उनके हाथो में पीतल का एक अमृत कलश था। इसलिए इस दिन पीतल के बर्तन भी खरीदे जाते हैं। 

धनतेरस के दिन झाडू खरीदना भी काफी शुभ माना जाता है। ऐसी मान्यता है कि इस दिन झाडू खरीदने और घर में सफाई करने से सभी नकारात्मक ऊर्जाओ का नाश हो जाता है। इस दिन घर के प्रत्येक कोने में सफाई की जाती है। जिससे मां लक्ष्मी और कुबेर देवता की कृपा सदैव बनी रहे और भगवान गणेश रिद्धि-सिद्धि के साथ घर मे प्रवेश करें।

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