गोवर्धन पूजा क्यों मानते है, जाने इसके पीछे की पौराणिक कथा।

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गोवर्धन पूजा क्यों मानते है

गोवर्धन पूजा क्यों मानते है, इसकी पौराणिक कथा क्या है? भारत में पुरे वर्ष त्योहारों की धूम रहती है हर महीने कोई न कोई त्यौहार होता ही रहता है। हर त्यौहार अपने आप में विशिष्ट होता है।

इन्ही त्योहारों में एक है गोवर्धन पूजा जहा दिवाली से दो दिन पहले सभी जगह धनतेरस की धूम देखने को मिलती है, वहीं दिवाली से अगले दिन गोवर्धन पूजा से सारा वातावरण कृष्ण की भक्ति में डूब जाता है।

भारत में मनाये जाने वाला हर त्योहार अपने साथ कोई न कोई पौराणिक कथा को जोड़े हुऐ है।हिन्दू शास्त्रों के अनुसार, कार्तिक महीने के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को ही गोवर्धन पूजा का त्यौहार मनाया जाता है।

गोवर्धन पूजा क्यों मानते है?

गोवर्धन पूजा के दिन सभी लोग अपने घर के आंगन में गाय के गोबर से गोवर्धन पर्वत का चित्र बनाकर उसकी गोवर्धन भगवान के रूप में पूजा करते हैं। आज हम गोवर्धन पूजा क्यों मानते है और इसकी पौराणिक कथा क्या है? इस विषय पर चर्चा करेंगे।

गोवर्धन पूजा क्यों मानते है

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कुछ लोग इस गोवर्धन पूजा को अन्नकूट के नाम से भी जानते हैं। यहाँ अन्नकूट शब्द का अर्थ होता है अन्न भण्डार का समूह जहा विभिन्न प्रकार के अन्न भगवान को समर्पित किये जाते है। इस दिन अनेको प्रकार के पकवान और मिठाई बनाकर उनसे भगवान को भोग लगाया जाता है।

गोवर्धन पूजा क्यों मानते है, इसकी पौराणिक कथा।     

गोवर्धन पूजा क्यों मानते है, इसके पीछे एक पौराणिक कथा प्रचलित है। इस कथा के अनुसार द्वापर युग में जब भगवान कृष्ण धरती पर अपनी मानव लीला कर रहे थे उसी समय देवताओ के राजा इन्द्र को अभिमान हो गया था।

तब इन्द्र के उस अभिमान को चूर करने के लिये भगवान श्री कृष्ण ने एक लीला को रचा। भगवान श्री कृष्ण ने देखा की सभी ब्रजवासी अनेको प्रकार के उत्तम पकवान बनाकर वर्षा करने के लिये देवताओ के राजा इंद्र की पूजा करने की तैयारी कर रहे है। 

श्री कृष्ण ने अपने पिता नन्द बाबा और सभी ब्रजवासियों से यह प्रश्न किया की आप सभी लोग किसकी पूजा के लिये तैयारी कर रहे हैं। कृष्ण की बातो को सुनकर सभी ने कहां की हम सब देवराज इन्द्र की पूजा करने की तैयारी कर रहे हैं।

गोवर्धन पूजा क्यों मानते है

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श्री कृष्ण ने सभी लोगो से पूछा की हम सभी इन्द्र की पूजा को क्यों करते हैं? तब नन्द बाबा ने यह उत्तर दिया की इंद्र हमारे लिये वर्षा करते हैं जिससे हमारी गायों के लिये चारा उत्पन्न होता है। इस बात पर भगवान श्री कृष्ण बोले फिर तो हमें गोर्वधन पर्वत की पूजा करनी चाहिए क्योंकि वह हमारी गाये के लिये चारा देता हैं, इस दृष्टि से तो केवल गोर्वधन पर्वत ही हमारे लिये पूजनीय है।

भगवान श्री कृष्ण की इस लीला और उनके तर्कों से सहमत होकर सभी ने इन्द्र की जगह गोवर्घन पर्वत की पूजा करने का निश्चय किया। जब देवराज इन्द्र को इस बात का पता चला तो उन्होंने इसे अपना अपमान समझा और क्रोधित होकर ब्रजवासियो पर मूसलाधार वर्षा को शुरू कर दिया।

प्रलयंकारी वर्षा को देखकर सभी बृजवासी भयभीत हो गये और भगवान कृष्ण के पास जाकर अपनी रक्षा करने के लिये प्रार्थना करने लगे। भगवान श्री कृष्ण ने सभी को गोवर्धन पर्वत के पास चलने को कहाँ वहां पहुंचकर श्री कृष्ण ने अपनी कनिष्ठा उंगली पर पूरा गोवर्घन पर्वत उठा लिया।

गोवर्धन पूजा क्यों मानते है

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सभी बृजवासियों ने अपनी गायो और बछडो समेत गोवर्धन पर्वत के नीचे शरण ली। इससे इन्द्र और क्रोधित हो गया और अत्यधिक तेज वर्षा करने लगा। इस प्रकार जब सात दिनों तक लगातार वर्षा करकर इन्द्र थक गये तो उन्हें इस बात का ज्ञान हुआ की यह सब भगवान श्री कृष्ण की लीला थी जो उसके अभिमान को तोड़ने के लिये उन्होंने की थी। 

अपने इस कृत्य से देवराज इन्द्र अत्यंत बहुत लज्जित हुए और भगवान श्री कृष्ण की शरण में जाकर कह कि हे प्रभु मैं आपको पहचान नहीं सका इसलिए अपने अहंकारवश यह भूल कर बैठा। आप दयालु हैं इसलिए मेरी भूल क्षमा करें। तब श्री कृष्ण ने देवराज इन्द्र को क्षमा कर दिया। इस पौराणिक घटना के बाद से ही गोवर्घन पूजा को मनाया जाने लगा। 

गोवर्धन पूजा कैसे करें? 

गोवर्धन पूजा क्यों मानते है अब जानते है की गोवर्धन पूजा कैसे करें? इसके लिए इस दिन सुबह उठकर स्नान आदि सभी किर्याओ को करने के पश्चात पूजन सामग्री लेकर पूजा स्थल पर बैठ जाइए और अपने कुल देवता या कुल देवी का ध्यान करे। उसके बाद पूजा के लिए गाय के गोबर से गोवर्धन पर्वत की आकृति को पुरे श्रद्धा भाव से तैयार करिये।

गोवर्धन पूजा क्यों मानते है

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गोवर्धन पर्वत की आकृति को एक लेटे हुये पुरुष के रूप में बनाया जाता है। फिर तैयार गोवर्धन की आकृति को फूल, पत्ती, टहनीयो और गायों की आकृतियों से सजा लीजिए। इसके बाद गोवर्धन की आकृति के मध्य में भगवान श्री कृष्ण की मूर्ति को रखा जाता है तथा नाभि के स्थान पर एक कटोरी के आकर का गड्ढा बना लिया जाता है।

उस जगह एक कटोरि या मिट्टी का दीपक रखा जाता है और फिर दूध, दही, गंगाजल, शहद और बतासे आदि के द्वारा इसकी पूजा की जाती है। पूजा के बाद प्रसाद को सभी में बांटा जाता है। पूजा के बाद जब आप भगवान को नैवेद्य अर्पित करे तो इस मंत्र से जरूर प्रार्थना करें:

लक्ष्मीर्या लोक पालानाम् धेनुरूपेण संस्थिता। घृतं वहति यज्ञार्थे मम पापं व्यपोहतु।।